A trip to Jageshwar: एकांत में जागेश्वर की ओर

टीवी इतना देखना होता नहीं परन्तु जब भी देखती हूँ तो यात्रा सम्बंधित शो देखना ही पसंद करती हूँ| एक बार एक शो में जागेश्वर धाम के बारे में देखा| और वह स्थान मन को छू गया| यूँ तो नैनीताल जाना हो ही जाता है परन्तु एक ऐसा भी रमणीक धाम उसके पास होगा यह पता नहीं था| प्रकृति की गोद में घने पेड़ों के बीच बसे शिवजी के इस धाम को देखने की इच्छा जागी तो मैं स्वयं को रोक न पायी| ऐसे ही एक दिन श्रावण मास के सोमवार को यहाँ घूमने का प्रण लिया|

जागेश्वर उत्तराखंड के अल्मोड़ा शहर से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पे स्थित है| पहाड़ों में सबसे अच्छी बात यह लगती है की किसी भी स्थान तक पहुंचने का रास्ता बड़ा ही रमणीक एवं सुन्दर होता है| उस समय श्रावणी मेला चल रहा था इसी कारण गाड़ी को कुछ दूरी पे ही रोक दिया गया | कुछ दूर पैदल चल कर जाना पड़ा| पूरे रास्ते नदी की एक धार के साथ हम भी चल पड़े सदियों पुराने महादेव के इस धाम की ओर| जैसे जैसे हम उसके समीप पहुंचे पुराने मंदिरों के अवशेष दिखने लगे| श्रावण मास हो, महादेव का धाम हो और वर्षा न हो इसकी कल्पना मैंने नहीं की थी| शीघ्र ही वर्षा होने लगी और सभी यात्री स्वयं को बचाने के लिए दुकानों में घुस गए| इसी कम भीड़ का फायदा उठाते हुए हम अपनी छतरियों को खोल पुनः उस धाम की ओर चल पड़े | वैसे संयोग की कल्पना मात्र से मैं उत्साह से भर उठी|

जागेश्वर धाम 100 से अधिक मंदिरों का एक समूह है| छोटे बड़े कई मंदिर देओदार पेड़ों के बीच स्थित एक ही स्थान पे पाए जाते हैं | कहा जाता है की यह भी पांडवों ने ही बनवाया था| उन् सभी मंदिरों में से 2 मुख्य मंदिर बड़े थे – महामृत्युंजय मंदिर एवं नागेष्वर ज्योतिर्लिंग| जी हाँ| नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की उपस्थिति गुजरात में है यह हम सब जानते हैं परन्तु ऐसा माना जाता है कि वह ज्योतिर्लिंग यही स्थित है| 12 ज्योतिर्लिंगों में ‘नागेशं दारूकावने’ और यही वह दारूकावन है|  लेकिन हमें तो महादेव के दर्शन से मोह था और इस प्राचीन धरोहर में स्वास लेने की इच्छा| शिवालय तो वैसे भी सदैव प्रसन्नता ही देता है| ऐसा कहा जाता है की श्री आदि शंकराचार्य इस धाम में आये थे और उन्होंने यहाँ मदिरों का जीर्णोद्धार किया था| यहाँ लगभग सभी मंदिरों में लिङ्गं रुपी प्रतिमा पायी जाती है| महामृत्युंजय मंदिर इन् सभी मंदिरों में सबसे बड़ा मंदिर है और यहाँ के शिवलिंग में भगवान् शिव के नेत्र रुपी एक आकृति चिन्हित है| ऐसे पौराणिक स्थानों पे आके यही लगता है की हमारे पूर्वज कितने संयम एवं सौंदर्य के साथ इन् स्थानों का निर्माण करते थे| ऐसे दुर्गम स्थान पे भी पत्थरों को तराश के ऐसे स्थान का निर्माण किया| आते समय भारतीय पुरातत्व विभाग के द्वारा संचालित संग्रहालय में भी गए| वहां नवीँ से तेरहवीं शताब्दी की मूर्तियां रखी हुयी थी जो जागेश्वर धाम से ही मिली थी| कई मूर्तियां तो तस्करों ने चोरी कर ली| इस संग्रहालय में शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, सूर्यनारायण आदि देवी देवताओं की मूर्तियां रखी हुयी हैं|

किसी भी स्थान की यात्रा हमेशा कुछ नया ही सिखाती है| हमारी धरोहर, हमारा देश ऐसी ही कई कहानियों से परिपूर्ण है|

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